बुधवार, 14 मई 2014

ज़रा सम्हल के

अब २४ घंटे से भी कम समय बाकी है। चुनाव में अपने मत का दान करने के के बाद मै भी कई और भारतीयोँ की  तरह अपने रोज़ी रोटी वाले काम कि तरफ़ बढ गया था, क्युकी दुर्भाग्यवश  ये किसी राजनीतिक दल कि नहीं हमारी स्वयम की ज़िम्मेदारी है। लग रहा था अब जो भी होगा वो १६ तारीख को पता चल ही जाएगा।  पर ये क्या, यहाँ तो पहले ही सरकार बना दि ग़ई  है , मंत्रिमंडल का गठन जारी है।  लोग अब भी इडियट बॉक्स के सामने बैठे हैं और अपने आप को तुष्ट करने वाले आंकड़े देख रहे हैं। पार्टियो  ने अपने न्यूज़ चैनल रुपी विज्ञापन बोर्ड अभी तक नहीं हटाए हैं, पर इससे कोइ फ़ायदा तो है नहीं ।

मै सोच रहा था कि कुछ ज़िम्मेदार चैनल तो कम से कम ये दिखाएंगे कि इस चुनाव में कितने प्रकार के मतदाताओं ने वोट किया है और उनकी आशाए क्या थीं , पर निराशा ही हाथ लगी। सब लोग सीटो के मायाजाल में एक बार फ़िर उलझ चुके हैं।  जो पत्रकार चुनाव के समय अपना वक़्त मतदाताओ के बीच बिता रहे थे वो फ़िर नेताओ कि तरह ही चुनाव के बाद मतदाताओ को भुल गए और खुद ही अपनी पसंदीदा पार्टी को सीटें बांटने लगे है।हमारे मुद्दे कहाँ हैं ? क्या ये हमारी समझ और समय का मज़ाक नहीं  है ?

जिस गति से हमारे मीडिया ने सरकार परीणाम पुर्व ही बना दी है , लगता है चुनाव आयोग की घोषणा के पहले ही ये कोइ जनहीत कि योजना भी लागु कर हि देगे।  पर क्यों न हो , जिनसे पिछले कुछ सालों मे मोटी कमाई कि है उनके प्रति ये निष्ठा का भाव होना भी चाहिए। चरित्र अभी इतना भी पतित नहीं हुआ है। सांप निकलने के बाद लाठी पीटना तो हमारी रगों में है। जब सब कहते है कि ये चुनाव पार्टियों ने नहीं मीडिया ने लडा है तो क्या परिणाम निकलने का श्रेय किसी और को लेने देंगें , कभी नही , हमारी चुनावी संस्कृति बदल चुकी है।  अब कई हजार करोड़ रूपये खर्च कर नेता बताते है की वो  महंगाई और ग़रीबी दूर करेंगे , कैसे करेँगे ये बताने मे कुछ हजार कऱोड और लगेंगे।  पर कैसे करेंगे ये क्यों बताए जब सिर्फ गरीबी  महंगाई हटाने के नारों से ही  सत्ता मिल जाए।

हम भारतियों को बड़ा हर्ष होता यदि हमारे पत्रकार कुछ और समय हम मतदाताओ के साथ बिताते , हमसे पुछते कि हमने क्यों वोट दिया , हमारी क्या उम्मीदें हैं।  इससे कम से कम नई सरकार में ये संदेश  तो जाता की वो जहां है वहाँ क्यों भेजा गया है , अगर अगली बार वोट माँगने आएं तो क्या काम करवाने हैं।   पर कहाँ, मिडिया तो परिणाम बताने में लगा है।  कृपया याद  रक्खे इस बार ६०% युवाओ ने वोट किया है जो अच्छे परिणाम चाहते है और सरकार और मीडिया के चरित्र को  बारीकी से परखने  वाले  है।  हम घोषणापत्र ले कर बैठे  है इस बार , जरा रुकिए और आगे थोड़ा सम्हाल कर चलिए आगे डगर मुश्किल हो सकती है . भ्रष्ट लोगो कि उम्मीद अब बहके  हुए यूवा हैँ जिनकी संख्या भी  दिन ब दिन कम हो  जा रही है। लोग जुड़ने लगे है , बोलने लगे हैं।  फिर कहता हूँ , ज़रा सम्हल के। 





शनिवार, 3 मई 2014

मतदान दिवस का अनुभव

१६ मई का अब इंतज़ार नही होता !!  मध्यप्रदेश में जब से मतदान खत्म हुए हैं , हमारे नेताओँ  कि तरह हि उनके समर्थक भी ग़ायब हैं। मेरे लिए कुछ नहीं बदला , आज भी एक पार्टी के समर्थन में सोशल मीडिया में पोस्ट करता हूँ पर अब कोई  अपने कुतर्क लेकर नहीं आता।  ऐसा लगता है की लड़ाई विचारधारा कि तो कभी थी हि नहिं , लोगों को बरगलाना था सो वो कोशिश कर रहे थे।  शायद कुछ पैसा भी मिला हो , कौन जाने।

मेरे लिए मतदान दिवस बड़ा कठिन रहा लगा कि स्वतंत्रता संग्राम का एक सिपाही हूँ।  आवागमन के बहुत कम साधनों के बीच मैने घर जा कर मतदान  करने की ठानि थी और ६ से ७ घंटे की कष्टप्रद यात्रा के बाद आखिर मैने अपने वोट कि पूर्णाहुति दे हि दि।  मेरे घर में ही हर पार्टी के वोटर देख ख़ुशी भी  बहुत हूई क्यूँकि देश मे हो न हो मेरे परिवार मे विचारों कि अभिव्यक्ति कि पुरी  स्वतंत्रता है. ९ सदस्यों के  संयुक्त परिवार मे से हर पार्टी को वोट गया बिना किसी कुतर्क के , घर में हि डिबेट भी की। काश मेरा देश भी  मेरे घर कि तरह होता।

शाम होते होते कई लोगों से मिला तो कहने लगे कि क्या अपना पैसा लगा के सिर्फ़ वोट डालने आए हो ? बड़ी निराशा हुई कि ये लोग कितने हताश है और मतदान  के महत्त्व से कितने अनजान हैं।  बस में बैठे-बैठे भी बस लोगो के हाथ कि उँगली पर वोटिंग का निशान ढूंढता रहा पर एक न मिला। शाम को कई लोग ऐसे भी मिले जिन्होने अपना वोट बेचा था।  लगा की ये लोग क्या हमारे देश के लिए पाकिस्तान से बड़ा खतरा नहीं  हैं , जरूर है क्युकि चन्द रुपयों के लिये इन्होने कई  लोगों का भविष्य बेच दिया , मै तो शर्मसार हुँ एसे लोगों  का परिचित कहलाकर।

कुछ निराशाओं के बीच आशाए भी हैं।  लग रहा है की अगले चुनाव तक बहुत कुछ बदलने वाला है क्युकी इस चुनाव का परिणाम बड़ा ही प्रेरणास्पद और रोचक होगा।  नेताओ और वोटरों के लिये भी ये समय सिखने का है क्यूकि कइयों के घ्रणित चेहरे उजागर हुए है और अगले ५ साल तक होते रहेंगे।

देखते रहिए और सीखते रहिए क्यूँकि युवा वोटर  ही हमारे भविष्य के वोटिंग पैटर्न का रचयिता होगा।

गुरुवार, 1 मई 2014

कुछ पंक्तिया जिन्हो ने दिल को छुआ।

कुछ पंक्तियाँ , अच्छी लगी, किसी भावुक व्यक्ति ने सुनाई।  पंक्तियों से ज्यादा उनकी आँखों के आंसुओ ने दिल को छुआ।

१. कौम को कबीलों मे मत बाँटों , ये जिंदगी क सफ़र लंबा है इसे मीलो में मत बांटों।
   हमारा भारतवर्ष तो एक अथाह सागर है , इसे ताल और झीलों  में  मत बाँटों।


२.   दिल तो भावों से भरा है मगर घर है कि अभावों से भरा है।
      जी चाहता है कि दिल जोड़ लूँ सबसे मगर ये जिस्म है कि घावों से भरा है।



गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मतदाता का दायित्व !!

लोकतंत्र में मतदाता क्या क्या काम होना चाहिए इस पर मतदाता ने  कभी सोचा न नेताओ ने।  क्या एक मतदाता को किसी चहरे को चुनना चाहिए या   किसी विचारधारा को या उसे सिर्फ अपने क्षेत्रीय  नेता को चुनना चाहिए ? प्रश्नो का उत्तर कौन देगा ? क्या कभी कोई टीवी पे बहस  चाहेगा ? इलेक्शन कमीशन को क्या जागरूकता फैलानी चाहिए ? सिर्फ वोट देने का पूछने भर से हो जाएगा क्या?

राजनीती में  अपराधियो का आना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है , सोचने का विषय तो ये है की ये वहां पहुंचे कैसे। क्या राजनीतिक पार्टियो को इनके हार जाने का तनिक भी डर  नहीं है , ऐसा क्यों है।  मुझे लगता है ये सब वोटर की करामात है। एक नोटा का अपाहिज विकल्प काफी नहीं है और ये विकल्प आया  भी तो आजादी के ६७ साल बाद , हैरानी की बात है।

राजनीती एक श्रंखला है जिसमे नीचे से चुना हुआ ही देर सवेर ऊपर जाता है।  अगर सिर्फ मतदाता अपने क्षेत्र से एक साफ़ और ईमानदार को चुने तो वो ही आगे चल कर एक साफसुथरी सरकार दे सकता है।  अपराधियो के चुन कर आने की संभावना जिस दिन समाप्त हो जाएगी उस दिन हमारा समाज , देश और राजनीती समृद्ध हो जाएगी।

किसी व्यक्ति विशेष की आरती उतारना हमारे लोकतंत्र की संस्कृति नहीं है।  मतदाता सवाल पूछे , अपने सवाल , अपने क्षेत्र के सवाल और  जिसका जैसा जवाब वैसा वोट। ये मतदाता का काम नहीं है की केंद्र में कौनसी सरकार आएगी उसका ये काम है की कैसी आएगी। जब सारे अच्छे लोग बहुमत में केंद्र में जाएंगे तो सरकार खुद ब खुद अच्छी ही बनेगी।  एक मतदाता से अच्छा उसके क्षेत्र के नेता को कोई नहीं जनता इसी लिए शुद्दिकरण का एकमात्र ये ही उपाय लगता है की अच्छे तो चुने और सच्चे को चुनें।

चुनाव आते ही धीरे-धीरे मुख्य मुद्दो से बड़ी आसानी से ध्यान भटका दिया जाता है।  भ्रष्टाचार , अपराधीकरण, गरीबी, किसानो की आत्महत्या की बात छोड़ धर्म और संप्रदाय की बात कर बड़ी आसानी से बरगला दिया जाता है।  हम कब सीखेंगे अपनी गलतियों से?  अब तो ईमानदार पर भी शक होता है की ये भी आगे चलकर कहीं  बेईमान हो जाएगा , पर सोचना ये है की ये आगे का रास्ता इतना बेईमान करने वाला बनाया किसने की हमें ही किसी पर भरोसा नहीं होता, क्या हम खुद जिम्मेदार नहीं हैं ?

भारत भाग्य विधाता को भाग्य के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए , कही देर न हो जाए।
धन्यवाद!!

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

चुनाव और बदलाव !!

लो भाई चुनाव आ गए!!  क्या अलग है इस बार ? क्यों लग रहा है कि कुछ बदलेगा ? क्यों वोट करने के दिन को छुट्टी मात्र मानाने वाले लोग भी उत्साहित हैं  वोट करने को ? चुनावो से भी कुछ बदला है क्या अपने देश में , सिर्फ पार्टी बदली है जिसने अपने से पहले वाली पार्टी कि परिपाटी को आगे बढ़ाया बस। गरीब अब भी कुछ ख़ास नहीं बदला है १९४७ के गरीब और आज के गरीब में सिर्फ है कि पहले का गरीब आशावान था आज निराशावान।  जिससे पूछो केहता है सब चोर है , लोकतंत्र में निराशा वो भी उनसे जिन्हे ये गरीब ही सबसे ज्यादा वोट देता है और चुन कर भेजता है।  क्यों दो चोर में से एक को चुनना पड़  रहा है ? सोचा है कभी ? क्या ये बदलाव है ?

६५% युवाओ का देश है  हमारा देश , युवा जो बस "आई हेट पॉलिटिक्स " केह के पल्ला झाड़ लेते थे आज सबसे अग्रिम पंक्ति पर है। निराश हो जाता हूँ जब कुछ तथ्यो को देख भ्रम टूट जाता है कि ये चुनाव कुछ अलग है।  विकास कि बात आगे रखने वाली हमारी पार्टिया जैसे जैसे चुनाव करीब आ रहा है जाति और धर्म के नाम पर लोगो को भरमाना शुरू कर चुकी है। नेताओ कि  कहें तो कोई यहाँ पिछड़ा है , कोई हिन्दू , मुस्लिम , यादव जाट है पर अब तक कोई नहीं मिला जो कहे कि वो भारतीय है।  ये ही कारण रहा होगा सैकड़ो साल गुलाम रेहने का , कब बदलाव होगा और हम  स्वतंत्र होंगे ? भ्रष्टाचार के नाम पे लहर का दावा करने वाले अपने घोषणापत्र में इसका उल्लेख करना भी जरुरी नहीं समझते , किया भी तो वो ही ६० साल पुराना जिसका  असर हम देख ही रहे हैं।

किसानो को अपनी फसल का ५०० से १००० रूपये मुआवजा देने का सिर्फ वादा करने वाले ५०० से १००० करोड़ सिर्फ गरीबी हटाने के विज्ञापन पे खर्च कर रहे हैं , क्या मेरे देश के युवा और किसान ने ये नोट किया या बस इस नोट के बदले हरा  नोट लेके अपने ५ साल बड़े सस्ते में बेच देगा ? ८०% गांव में रहने वालो कि बात तो कोई कर ही नहीं रहा और किसी को कोई तकलीफ भी नहीं है , किसान घोषणापत्रों से जैसे गायब हैं  बस 'जय जवान जय किसान ' जैसे नारो में हैं। एक मोबाइल फ़ोन भी बिना ६ महीने गूगल कर न लेने वाला युवा वोट करने के पहले १ घंटा भी जानकारी नहीं जुटता , देश के प्रति ये जस्बा तो विचलित कर देता है क्युकि ये ही ६५% आगे बहुमत होगा।

रुग्ण मानसिकता आज भी हावी है , वो मेरी जात का है।  हम तो कोंग्रेसी / भाजपाई / सपाई / बसपाई है।  कुछ नहीं बदलने वाला।  सब एक ही हैं।  क्या फर्क पड़ता है।  जैसे तर्क देने वालो को कब किसी मनोवैज्ञानिक का सहारा मिलेगा , भगवान् ही जाने।  पुश्तैनी वोटर बड़ा आश्चर्यचकित कर देते है , अंधभक्ति का परिसीमन किसी ने  न किया होगा इसी लिए बढ़ती  जा रही है।   दो शासको के बीच बंटा  मेरा देश छटपटा  रहा है पर इसमें रेहने वालो को इसका कोई इल्म भी नहीं है। जो नेता ५ साल दिखाई भी न दे उसकी भरमाने एवं भड़काने वाली बातो में आ जाने वाले हम कुछ रुक कर सोचते भी नहीं। ५ साल में घर का रंग बदल देने वाले हम  लोग नेता क्यों नहीं बदल देते?  ६० साल पुरानी सड़ांध मारती  पार्टियो को क्यों नहीं बदल देते ? क्यों इतनी निराशा है ? ये सवाल क्या नहीं पूछे जाना चाहिए।

अपराधिक प्रवृति वाले बलात्कारी,  खुनी , डाकू , चोर , भ्रष्टाचारियो से समाज के डर से कोई सम्बन्ध भी न रखने वाले हम भारतीय कैसे उन्ही को अपना प्रतिनिधि बना कर भेज देते है ? अपनी कहूं तो मैं कैसे ३८% दागी प्रतनिधियों वाली एवं विकास का दावा करने वाली पार्टी को वोट दे दूँ , कुछ लोग समझने आए भी पर लगा उन्हें अपनी रुग्णता का उपचार करवाने कि जरुरत है क्युकी वे भ्रष्टाचार , सम्प्रदायिकता , और अन्य  सभी कुरीतियो को एक अभिन्न अंग मानाने को मजबूर कर रहे थे । और ६० साल से ज्यादा शासन करने वाली पार्टी का काम क्या अब तक समझ नहीं आया।  देश को नौकरियों के सृजन से ज्यादा नई  विचारधारा के सृजन कि आवश्यकता है। नौकर बनाना किसी को पसंद नहीं है पर ८०% किसानो का पलायन रोक दे तो तो बहुत कुछ ठीक हो सकता है।  कृषि को  उत्कृष्ट होने कि जरुरत है।  पर हमारे नेता तो उद्योगपति गामी है , पैसा जो वहाँ  से मिलता है।कब हम मालिक बन के वोट करेंगे , जो कि हम हैं ।

बदलाव कि बात तो हो रही है और हमेशा से होती आई है पर क्या बदलना है ये सोचने का विषय है।  सिर्फ सरकार/पार्टी बदलने के लिए वोट करे या देश बदलने के लिए वैसे  इतिहास में देश बदलने के लिए वोट कम ही हुआ है।  कुछ अतिउत्साही चुनाव के नतीजो को आंक कर वोट देते है न कि अपनी पसंद से , विश्वास के साथ कह सकता हु कि उन्हें अपने नेता के बारे में पूर्ण जानकारी होगी भी नहीं।

जो लोग मेरे इस लेख को पढ़े उनसे मेरी यही प्रार्थना है कि वोट उसे दें जिसपर भरोसा हो , जिसके साथ खड़े होने में शर्म न हो क्युकी वो और उसके सहयोगी दागी है , ईमानदारी भी मिल जाएगी , जरा ढूँढना पड़ेगा।  जो हमारे रोजमर्रा के जीवन का सरलीकरण करे व गरीब को रिश्वत देने के लिए साहूकार से कर्ज न लेना पड़े।  विकास कि बात तो करे पर ये भी बताए कैसे और किसका। महंगाई के मुद्दे पर चुनाव लड़  कर विपक्षी पार्टी द्वारा जारी कि गई कीमतो को वापस लेने का भी दावा करे . ये भी बताए कि कही खुद तो काले धन से काम नहीं कर रहा है , क्यों कि काला धन वापस लाना फिर उसके बस कि बात नहीं रह जाएगी . जाति तो कभी नहीं जाएगी पर कही देश हाथो से न चला जाए , अपराधियो के भड़काऊ भाषणो के पीछे भागने से कही ये अपराधीकरण कि आंच हमारी चौखट  तक न आए।  कृपया अपना वोट न बेचें , क्युकी चंद पैसो से आपके और आपके बच्चो के भविष्य कि कीमत नहीं लगाई जा सकती।

मुद्दे और नेता पहचाने , अच्छे चरित्र और विचारो को वोट दें !! धन्यवाद !!

जय हिन्द !!

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

निवेदन !!

मेरी इस लिखने कि हिमाकत का असर हुआ भी तो किस पर , खुद मुझ पर।  है न हैरान करने वाली बात।  बात निकाली ही ये बताने के लिए है कि मेरा लिखने का उद्देश्य सिर्फ अपने विचारो को व्यक्त करना और हिंदी को सम्मान देना है , मेरे विचार भी स्वयं मेरे ही लिए है ताकि आने वाले वर्षो में मै  खुद कि मानसिकता में विकास और बदलाव देख सकुं। सच ये भी है कि फेसबुक पर साझा करता हूँ  पर आपको अच्छा न लगे तो छोड़ दीजिए और एक हंस कि भांति  अपने काम कि चीज़ ले के आगे बढ़िए , बढ़ते रहिए।

मेरे कुछ मोदी और राहुल भक्त दोस्तों   को बड़ी ठेस पहुची, केहने लगे इसके बारे में तो लिखते हो उसके बारे में क्यों नहीं।  समझ आ रहा है पत्रकारो का क्या होता होगा, अरे भाई मै  कोई पत्रकार तो नहीं बस मलंग हुँ जो ठीक लगा वो कहा जो नहीं लगा वो भी बता दिया।  आखिर मैंने कब कहा कि सिर्फ मेरे विचार ही सही है।

कृपया मुझे मोदी या राहुल गांधी विरोधी न समझे न ही अरविन्द केजरीवाल समर्थक।  देश हित में जो मुझे एक नागरिक होने के नाते पूरी ईमानदारी से सही लगता है वो ही लिखता हूँ, व्यक्ति पूजा कभी कि नहीं और चापलूसी मुझे आती नहीं। कसम खा रखी  है जिस भी पार्टी का अच्छा इंसान (जिसका अपराध और अपराधी से दूर दूर तक  नाता न हो ) चुनाव में मेरे क्षेत्र से लड़ेगा उसे वोट दूंगा , अब ये पार्टियो के चिंतन का विषय है कि मेरे जैसे कितने सोचने वाले है और वो किसे चुनेंगे कि हमारा वोट उन्हें मिले।

चुनाव का मौसम है , बड़ी जोश कि गर्मी है बस इतना ध्यान रखना इस गर्मी में कही आपसी रिश्ते न झुलस जाए और हमारे नेता हमेशा कि तरह फूट डाल  के शासन कर ही न ले।  आखिर हम ही तो जीतने देंगे।  कभी सोचता हु वो चुनाव कब होगा जब जनता जीतेगी।  खैर हमें क्या। समझ आता है कितना पीड़ादायक होता होगा इस ६६ साल पुराने सिस्टम में थोड़ी सी भी आवाज करना , मेरी थोड़ी आवाज निकल रही है तो मेरे अपनों को पीड़ा हुई।  अच्छा है सरकार तक आवाज नहीं पहुची वर्ना हश्र तो सबको पता ही है, लोकतंत्र ही है न ?

फिर से निवेदन है कि मेरे विचार सिर्फ मेरे लिए है , भूल चूक लेनी देनी माफ़।  और हाँ कृपया ये न सोचे अब नहीं लिखूंगा , सिलसिला चलता रहेगा , जो गलत होगा उसे गलत बताने में कैसा डर और शर्म।  मेरा देश है , जैसा भी है एक दिन आजाद जरुर होगा।

कृपया अपने पसंदीदा नेता के साथ -साथ मुझ अदने  से मित्र को भी अपनी बात केहने कि आजादी का समर्थन दीजिये और कुछ भी दिल पे न लीजिए , अपना तर्क जरुर दीजिए वैचारिक शुद्धि के लिए ।

आपका अपना मित्र ,
अर्पित


गुरुवार, 27 मार्च 2014

वोटर और कार्यकर्ता

चुनाव आते -आते लग रहा है वादों का स्तर तो बढ़ रहा है पर राजनीती और व्यक्तियो का स्तर दिन ब दिन गिरता ही जा रहा है।  छींटाकशी का दौर है ,  कोई किसी को चोर केहता है तो कोई किसी को पाकिस्तानी एजेंट।  एके -४९ और नमो-५६ के बीच आम नागरिक बड़े भ्रम में है , पर ये भ्रम नया कहाँ  है मै  तो जब से थोडा समझने लगा तब से देख रहा हूँ . वोटर कि  मनोस्थिति  को नमो-स्थिति  में लाने के ये प्रयास सराहनीय तो नहीं है , क्युकी विचारधाराओ का स्वछंद विचरण ही असल लोकतंत्र का परिचायक है।  मतदाता किसी एक विचारधारा को अपनाए और अगले पांच साल फिर कही भीड़ में गुम  हो जाए. ये भी कमाल ही है न कि एक भारतीय नागरिक चुनाव आते ही मतदाता हो जाता है वर्ना उसकी एक नागरिक के रूप में पहचान  सिर्फ भीड़ का हिस्सा ही तो है . जब कोई कार्यकर्ता जिसे कई बार कई कारणो से असामाजिक तत्व पाया , हमारे घर के दरवाजे पर वोट मांगने आता है अपने पवित्र नेताजी के लिए तो समझ नहीं आता किस भावना से वोट दें।  डर  तो लगता ही है . पर विकल्प ही क्या है।

 वोटर और कार्यकर्ता में मुझे थोडा संशय है। पुश्तैनी वोटर सुनकर चकित हो जाता हूँ , मुझे तो लगता था कि सिर्फ कार्यकर्ता वफादार होता है , राष्ट्र विरोधी गतिविधियो के बाद भी अपनी पार्टी से प्यार करता है (देश से नहीं ) . मगर जब अपने मित्रो से वोट देने के बारे में विचार जाने तो कुछ पीढ़ियों से पार्टी भक्ति करते परिवारो से निकले , समझ नहीं आता लोग ऐसा क्यों केहते है कि शिक्षा से समझ आती है।  ऐसे वोटरो का वोट कोई लहर नहीं देखता बस परिवार देखता है , देश से इन्हे क्या। शक तो होता है कोई नई  ईमानदार पार्टी पिछले ६६ सालो में पनप क्यों नहीं पाई , पनपने ही नहीं  दिया गया या हमारे देश  से ईमानदारी अंग्रेजो के साथ चली गई थी , सोचने वाली  बात तो लगती है।

एके ४९ कि बात करे तो मुझे हिम्मत दिखती है , कद्दावर शब्द को चुनौती दे डाली है। सवाल पूछ पूछ कर नाक में दम कर रक्खा है , पता नहीं कहाँ से दस्तावेज भी ले आता है हमारी सीबीआई को तो कभी न मिले थे ये , न ही धुरविरोधी कांग्रेस या बीजेपी को।  शक तो तब होता है जब कोई जवाब देने भी नहीं आता , सवाल जवाब तो लोकतंत्र का बहुत ही जरूरी अंग होना चाहिए। बेचारे वफादार कार्यकर्ताओ को छोड़ रखा है जो बस  झाकते है।  कभी तो केहते है ईमानदार व्यवस्था कभी हो ही नहीं सकती और कभी दूसरी पार्टी ज्यादा बुरी है हम कम बुरे है बताने में लगे है।  कभी तीखा सवाल आजाए तो केहते है उनसे सवाल क्यों नहीं पूछते , अरे भाई उनसे भी पूछ लेंगे पहले जवाब तो दो , पर नहीं।  कई सवाल अँधेरे में है और लग रहा है चुनाव तक रहेंगे , और हमारा अंधभक्त वोटर ठप्पा लगा आएगा , और जो अंधभक्त नहीं है वो इस आस में कि अगले ५ साल में शायद जवाब मिले कम बुरे को चुनेगा (कम बुरे से मतलब ज्यादा मौका नहीं मिला लूटने का ) .

सवाल पूछने वाले भी सावधान रहे , कही स्याही और अंडे न  पड़ जाए. काले झंडे पहली बार बाहर निकले है , पहले इस तरह का विरोध तो नहीं हुआ था , दोनों पार्टिया खुश थी शांति से एकदूसरे ही झूठी बुराई कर के काम चल रहा था , बड़ा भाईचारा था।  हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर वोटर बाटना भी क्या कला थी / है।  सेक्युलर वोटर बड़ा खतरनाक है (देश हित में नहीं  ), उसे जाती में बांटने से वो ये भी नहीं देख पाता कि जिस  हिंदूवादी पार्टी का वो भक्त है उसी के लोग पवित्र हिन्दू मंदिर के बाहर अंडे और गालिया फेंक रहे है।  ये ही तो अंधभक्ति है। वो ये भी नहीं देखता कि मुसलमान समुदाय का ६० साल से पीछे होना किसकी देन है।

मेरे जैसा भी एक वोटर है जो बस काश में  जी रहा है।  काश मुझे सवालो के जवाब मिलते , मेरा गाव अब भी क्यों पीछे है ? नालिया , स्ट्रीट लाइट  क्या होती है वहाँ  जा कर कोई परिभाषित करे . हवा से चल रही है क्या सब पार्टियाँ ? पैसे का हिसाब मांगना क्या गलत है जब नेता हमें मालिक बोलते है?  मेरा टैक्स का पैसा कहाँ लग रहा है ? देश में महंगाई के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाले नेताओ को अरबो रूपये अपने मार्केटिंग में खर्च करने में क्या कोई शर्म आती है ? नेता को सबसे ज्यादा डर जनता से क्यों लगता है, सामना क्यों नहीं करते ? और फिर पांच साल  अंतर्ध्यान रहने के बाद किस मुह से वोट माँगने आजाते हो ?

बड़े दिल  वाली है मेरे  देश कि जनता , खुद देश लुटवाने हो तैयार है बिना किसी तैयारी के अपने जीवन के पांच साल किसी के हवाले कर रही है । अंग्रेज क्या बुरे थे ?